॥ हेरम्ब गणपति स्तोत्रम् ॥
पाठ, अर्थ और पूजा विधि

स्रोत: मुद्गल पुराण | रचयिता: माता गौरी (पार्वती)

हेरम्ब कौन हैं?

गणेश जी को हम सब मूषक पर सवार, एक मुख वाले रूप में जानते हैं। पर तंत्र-परंपरा में एक और रूप है — पांच मुख, दस भुजाएं, और वाहन सिंह। इसी का नाम है हेरम्ब। यह रूप तब पूजा जाता है जब संकट इतना गहरा हो कि सामान्य पूजा-पाठ काफी न लगे।

शब्द को तोड़कर देखें तो बात और साफ हो जाती है — "हे" यानी दीन या असहाय, "रम्ब" यानी रक्षक। हेरम्ब यानी असहायों के रक्षक। नाम में ही वादा छिपा है।

स्तोत्र की पृष्ठभूमि

कहानी मुद्गल पुराण की है। माता गौरी किसी असुर के संकट में घिर गईं, और हैरानी की बात यह कि उस क्षण स्वयं शिव सहित सारे देवता भी कुछ खास नहीं कर पा रहे थे। तब माता ने अपने पुत्र को पुकारा — पर एक साधारण भक्त की तरह नहीं, मां की तरह। उलाहना देकर, हठ के साथ, यह कहते हुए कि "अगर तू नहीं आया तो मैं यहीं प्राण त्याग दूंगी।"

यही करुण पुकार आगे चलकर हेरम्ब स्तोत्रम् बनी। इसमें भक्ति औपचारिक नहीं है — यह मां-बेटे की सीधी बातचीत है, जिसमें शिकायत भी है और भरोसा भी।

॥ मूल संस्कृत पाठ ॥

गौर्युवाच ।

गजानन ज्ञानविहारकानि-न्न मां च जानासि परावमर्षाम् ।
गणेश रक्षस्व न चेच्छरीरं त्यजामि सद्यस्त्वयि भक्तियुक्ता ॥ 1 ॥

विघ्नेश हेरम्ब महोदर प्रिय लम्बोदर प्रेमविवर्धनाच्युत ।
विघ्नस्य हर्ताऽसुरसङ्घहर्ता मां रक्ष दैत्यात्त्वयि भक्तियुक्ताम् ॥ 2 ॥

किं सिद्धिबुद्धिप्रसरेण मोह-युक्तोऽसि किं वा निशि निद्रितोऽसि ।
किं लक्षलाभार्थविचारयुक्तः किं मां च विस्मृत्य सुसंस्थितोऽसि ॥ 3 ॥

किं भक्तसङ्गेन च देवदेव नानोपचारैश्च सुयन्त्रितोऽसि ।
किं मोदकार्थे गणपाद्भृतोऽसि नानाविहारेषु च वक्रतुण्ड ॥ 4 ॥

स्वानन्दभोगेषु परिहृतोऽसि दासीं च विस्मृत्य महानुभाव ।
आनन्त्यलीलासु च लालसोऽसि किं भक्तरक्षार्थसुसङ्कटस्थः ॥ 5 ॥

अहो गणेशामृतपानदक्षा-मरैस्तथा वासुरपैः स्मृतोऽसि ।
तदर्थनानाविधिसम्युतोऽसि विसृज्य मां दासीमनन्यभावाम् ॥ 6 ॥

रक्षस्व मां दीनतमा परेश सर्वत्र चित्तेषु च संस्थितस्त्वम् ।
प्रभो विलम्बेन विनायकोऽसि ब्रह्मेश किं देव नमो नमस्ते ॥ 7 ॥

भक्ताभिमानीति च नाम मुख्यं वेदे त्वभावान् नहि चेन्महात्मन् ।
आगत्य हत्वाऽदितिजं सुरेश मां रक्ष दासीं हृदि पादनिष्ठाम् ॥ 8 ॥

अहो न दूरं तव किञ्चिदेव कथं न बुद्धीश समागतोऽसि ।
सुचिन्त्यदेव प्रजहामि देहं यशः करिष्ये विपरीतमेवम् ॥ 9 ॥

रक्ष रक्ष दयासिन्धोऽपराधान्मे क्षमस्व च ।
क्षणे क्षणे त्वहं दासी रक्षितव्या विशेषतः ॥ 10 ॥

स्तुवत्यामेव पार्वत्यां शङ्करो बोधसम्युतः ।
बभूव गणपानां वै श्रुत्वा हाहारवं विधेः ॥ 11 ॥

गणेशं मनसा स्मृत्वा वृषारूढः समाययौ ।
क्षणेन दैत्यराजं तं दृष्ट्वा डमरुणा हनत् ॥ 12 ॥

ततः सोऽपि शिवं वीक्ष्यालिङ्गितुं धावितोऽभवत् ।
शिवस्य शूलिकादीनि शस्त्राणि कुण्ठितानि वै ॥ 13 ॥

तं दृष्ट्वा परमाश्चर्यं भयभीतो महेश्वरः ।
सस्मार गणपं सोऽपि निर्विघ्नार्थं प्रजापते ॥ 14 ॥

इति मुद्गलपुराणे हेरम्ब स्तोत्रम् ।

भावार्थ

श्लोक 1-2 — पुकार

माता गौरी गणेश को पुकारती हैं: "हे गजानन, क्या तुझे मेरी पीड़ा दिखती ही नहीं? बचा ले मुझे, वरना अभी तेरे चरणों में ही प्राण त्याग दूंगी।" फिर विघ्नेश, हेरम्ब, असुरों के संहारक — इन नामों से पुकारते हुए दैत्य से रक्षा मांगती हैं।

श्लोक 3-5 — उलाहना

यहां माता सीधे सवाल पूछती हैं। सो रहा है क्या? सिद्धि-बुद्धि (अपनी पत्नियों) में उलझा है? धन के विचार में डूबा है? या मोदक के लोभ में भूल बैठा मुझे? यह शिकायत नहीं, हक़ है — मां का बेटे पर हक़।

श्लोक 6-8 — याद दिलाना

देवता और असुर दोनों तेरा स्मरण करते हैं, और तू सबके लिए दौड़ता है — पर मुझे, अपनी दासी को भुला बैठा। हर हृदय में तू ही बसता है, फिर देरी क्यों? तेरा नाम ही भक्तवत्सल है — तो आ, इस असुर का अंत कर।

श्लोक 9-10 — अंतिम चेतावनी

"कुछ भी तुझसे दूर नहीं, फिर क्यों नहीं आया? मैंने प्राण त्याग दिए तो तेरा यश ही उल्टा हो जाएगा।" और फिर वही पुकार, दोहराई हुई: रक्ष रक्ष, हे दयासागर, हर क्षण मुझे तेरी रक्षा चाहिए।

श्लोक 11-14 — समाधान

इतनी स्तुति सुनकर शिव को खतरे का आभास हुआ। गणेश को याद कर वे बैल पर बैठे, दैत्य पर डमरू से वार किया — पर असुर तो शिव को गले लगाने दौड़ पड़ा, और शिव के शस्त्र तक कुंठित हो गए। यह देखकर स्वयं महेश्वर भयभीत हुए, और तब उन्होंने भी गणपति का स्मरण किया — तभी जाकर संकट टला।

पूजा एवं जप विधि

विनियोग

ॐ अस्य श्रीहेरम्ब गणपति मंत्रस्य गणक ऋषिः, गायत्री छन्दः, हेरम्ब गणपति देवता, 'ग' कारो बीजं, बिंदुः शक्तिः, चतुर्वर्ग सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।

न्यास

ध्यानम्

मुक्ताकांचन नीलकुण्ड घघुसेरांचयैस्त्रिनेत्रान्वितैः नागस्यैर्हरि वाहनं शशिधरं हेरम्बर्कप्रभम्। दप्तं दानमभीति मोदक रदं टंकं शिरोक्षात्मिकाम् मलं मुद्गरमंकुशं त्रिशिखकं दोर्भिर्दधानं भजे॥

मोती-सोने-नीलम के आभूषणों से सजे, तीन नेत्रों वाले, सिंह-सवार, चंद्रमौलि हेरम्ब — सूर्य जैसे तेजस्वी, दस भुजाओं में दान, अभय, मोदक, टंक और त्रिशूल थामे हुए।

हेरम्ब मूल मंत्र

ॐ नमो हेरम्ब मदमोहित मम संकटान् निवारय निवारय स्वाहा।

अर्थ — हे मद और मोह हरने वाले हेरम्ब, नमस्कार है तुझे; मेरे संकट दूर कर, दूर कर।

एक छोटा बीज मंत्र भी प्रचलित है, त्वरित स्मरण के लिए:

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः हेरम्बाय नमः।

जप के नियम

पहले गुरु या इष्टदेव का स्मरण करें, पंचोपचार पूजन करें, दुर्वा और मोदक अर्पित करें। फिर अपनी बात गणपति के सामने खुलकर रखें। जप संख्या — कम से कम 11 या 21 हज़ार, 3 से 7 दिन में पूरी करें; या रोज़ 11 माला, लगातार 11 या 21 दिन। बुधवार और चतुर्थी इसके लिए सबसे उपयुक्त दिन माने गए हैं, हालांकि घोर संकट में इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है।

मूर्ति सामग्री अनुसार लाभ

पुष्य नक्षत्र के दिन अंगुष्ठ-प्रमाण गणपति मूर्ति बनवाने की परंपरा है। सामग्री के अनुसार फल भी अलग बताया गया है:

सामग्रीलाभ
लाल चंदनसभी कामनाओं की पूर्ति
श्वेत आक (मदार)सर्वकामना सिद्धि सहित अतिरिक्त फल
नीम की लकड़ीशत्रु-बाधा शमन
गुड़सौभाग्य प्राप्ति
मिट्टीविशिष्ट इच्छाओं की सिद्धि
चांदीअष्ट-सिद्धि व सर्वसिद्धि

फलश्रुति

नियमित पाठ से क्या मिलता है? परंपरा कहती है — तत्काल संकट-निवारण, भय और असुरक्षा का धीरे-धीरे कम होना, कानूनी उलझनों में राहत, और मन में एक स्थिरता जो कठिन समय में भी टूटती नहीं। कुछ ग्रंथों में स्वास्थ्य-लाभ और आत्मबल की वृद्धि का भी उल्लेख मिलता है — इसे श्रद्धा के साथ देखा जाना चाहिए, चिकित्सा के विकल्प के रूप में नहीं।

प्रश्न-उत्तर

"हेरम्ब" का अर्थ क्या है?

"हे" यानी दीन/असहाय, "रम्ब" यानी रक्षक — असहायों के रक्षक।

यह स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

मुद्गल पुराण से, जहां माता गौरी गणेश की स्तुति करती हैं।

हेरम्ब स्वरूप की पहचान क्या है?

पांच मुख, दस भुजाएं, और सिंह वाहन — गणेश के 32 तांत्रिक रूपों में एक।

पाठ कब करें?

नियमित साधना के लिए बुधवार व चतुर्थी उत्तम; पर घोर संकट में किसी भी समय पढ़ा जा सकता है।

जप कितनी बार करें?

रोज़ 11 या 21 माला, 11-21 दिन तक। या 11,000/21,000 जप कुछ दिनों में पूरे करें।

क्या महिलाएं यह पाठ कर सकती हैं?

हां — रचयिता स्वयं माता पार्वती हैं, इसलिए यह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से उपयुक्त माना गया है।

मूल मंत्र का अर्थ?

"ॐ नमो हेरम्ब मदमोहित मम संकटान् निवारय निवारय स्वाहा" — हे हेरम्ब, मेरे संकट दूर कर।

क्या गुरु-दीक्षा ज़रूरी है?

नहीं। यह मूलतः मां-बेटे का संवाद है; सच्ची श्रद्धा से कोई भी इसे पढ़ सकता है।

हरिशंकर नागेश्वर

माँ नर्मदा के तट, नर्मदापुरम् (मध्य प्रदेश) में निवास। पिछले 25 वर्षों से ध्यान-साधना और सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन में समर्पित। अपने इष्ट को प्रसन्न करने के इसी प्रयास में, गणपति बप्पा के स्तोत्र, चालीसा व आरती सटीक विधि और सही अर्थ के साथ आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूं। पूरा परिचय पढ़ें →